
लेखिका तृप्ती चिद्रावार कार्यकारी संपादिका प्रबोधिनी न्युज
कहते हैं, जब एक औरत आगे बढ़ती है, तो वह सिर्फ खुद नहीं, बल्कि एक पूरी पीढ़ी को आगे ले जाती है। लेकिन क्या हर औरत को वह उड़ान मिल पाती है जिसकी वह हकदार होती है? नहीं, कई बार नहीं। जिम्मेदारियों का बोझ, समाज की बंदिशें, अपने ही डर और संकोच—ये सब मिलकर एक औरत को उसके सपनों से दूर कर देते हैं। लेकिन सच तो यह है कि हर औरत में ताकत होती है, बस उसे खुद को पहचानने की जरूरत होती है।
खुद को मत रोको, सपनों को मत तोड़ो
एक माँ जो हर सुबह सबसे पहले उठती है, सबसे आखिर में सोती है—क्या उसके सपने नहीं होते?
एक बेटी जो अपने घर की लाडली होती है, लेकिन शादी के बाद उसका अस्तित्व बदल जाता है—क्या उसकी कोई पहचान नहीं होती?
एक बहन जो सबके लिए त्याग करती है—क्या उसका कोई हक नहीं होता?
हर औरत के दिल में कोई ना कोई सपना पलता है, कोई चाहत होती है, कोई अधूरी ख्वाहिश होती है। पर अक्सर वह अपनी भावनाओं को अंदर ही दबा लेती है, सोचती है कि ‘अब बहुत देर हो गई है।’ लेकिन सच तो यह है कि देर कभी नहीं होती। अगर आपमें चाहत है, तो आपका सपना आज भी जिंदा हो सकता है।
तुम्हें कोई रोक नहीं सकता
अगर तुम्हारे मन में कोई सपना है, तो उसे मत छोड़ो। अगर कोई कहे कि तुम नहीं कर सकती, तो उसे गलत साबित करो। – अगर तुम्हें लगे कि अब बहुत देर हो गई है, तो याद रखो—सूरज भी हर दिन नए सिरे से निकलता है।
“हर औरत अपने आप में एक कहानी है। सवाल यह है—क्या वह अपनी कहानी खुद लिखेगी, या किसी और के लिखे हुए पन्नों पर चलेगी?
आज ही तय करो कि तुम अपनी कहानी खुद लिखोगी, अपने सपनों को सच करोगी, और अपनी जिंदगी को अपने तरीके से जियोगी। क्योंकि तुम सिर्फ किसी की बेटी, बहन, पत्नी या माँ नहीं हो—तुम खुद एक पहचान हो, एक रोशनी हो, और तुम्हारी उड़ान अनंत है!















