
संत ज्ञानेश्वर | सुखाची सावली |
सर्वांची माऊली | प्रेमाचीच ||१||
बाल्य अत्याचार | सीमा ओलांडली |
दुःखाची झाकोली | आयुष्यात ||२||
तर धाडसाने | शांतते सोसले |
धीरें तोंड दिले |अन्यायाला ||३||
सर्वसामान्यांस | सोपी ज्ञानेश्वरी
लिहीली तयांनी | कल्याणार्थ ||४||
आमचा ज्ञानोबा | कणखरपणे |
उभा प्राणपणे | जनहितां ||५||
सकल अन्याय | सहन करणे |
सदैव झिजणे | ब्रीद ठरे ||६||
अल्पायुषाचे हे | कारण समर्थ |
लोककल्याणार्थ | झीजतसें ||७||
मुर्ती ही लहान | पण कीर्ती किती |
महानच हस्ती | जगतात ||८||
धीटपणे उभे | सोसे अपमान
समाधी घेऊन | जीव अंत ||९||
दाता दुर्लभ तो | जगी एक झाला ||
लोक कल्याणाला | सदा झिजे ||१०||
जीवनाचे सार | जे पसायदान |
अर्पले जीवन | पूर्णपणे ||११||
सोनियाचा दिनु । समाधी सोहळा ॥
झाले सारे गोळा । एकादशी ॥१२॥
गुणगान गाता | जीवन हे सार्थ ||
जगण्याला अर्थ | नीला म्हणे ||१३||
(स्वरचित)
©® नीला चित्रे
चिंचवड पुणे















