
ज्योतिर्लिंग अर्थात ज्योति, प्रकाश उजाला किस्में लिंग में प्रकाश है । अब लिंग अर्थात शरीर का इंद्रजीत/ अवयव/ शरीर का एक अंग, हिस्सा। क्या इंद्रीयोमे ज्ञान का प्रकाश है ?
नही ! क्योंकि गर इंद्रीयोमे ज्ञान होता तो सारे कर्म पुन्यकर्म होते सकर्म होते। फिर ज्योतिर्लिंग क्यों कहते हैं ??
श्रीमद् भागवत गीता अध्याय 3 /42
इन्द्रियाणि परान्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः। मनसस्तु परा बुद्धिः बुद्धेर्यो बुद्धे:परतस्तु स: ।
भावार्थ – इसका मतलब है कि इंद्रियां स्थूल शरीर से श्रेष्ठ हैं और इंद्रियों से भी श्रेष्ठ है मन. मन से परे बुद्धि है और बुद्धि से भी परे है परमात्मा । इंद्रिय बड़ी प्रबल है मन इंद्रियों से बड़ा है बुद्धि मन से बड़ी है किंतु बुद्धि से बड़ा है परमात्मा ।
गायन पुजन इंद्रीयोंका साकार का होता है किंतु वास्तविक पुजन होता है साकार का निराकार की पुजा कैसे करें ! और साकार है मन ! मनरूपी आत्मा जिसको बोला इन्द्रियाणि परान्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः। इंद्रिय बड़ी प्रबल है मन इंद्रियों से बड़ा है । किंतु मन को भी कंट्रोल करनेवाली आत्मा है बुद्धि , मनसस्तु परा बुद्धिः और इस बुद्धि से भी परे बुद्धेर्यो बुद्धे:परतस्तु स: । बुद्धि से बड़ा है परमात्मा । परमपिता नहीं बोला परमात्मा वो परमात्मा जो ही बुद्धि मानोंकी बुद्धि शिव बोला है । मैं जब साकार में आऊ तब बाबा। तो बोला ” प्रवेष्टुम “के साथ अध्याय 11/54 यह भी बोला ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्वेन मुकरर रथ में भलीभांति तत्व पूर्वक देखने और उसमें प्रवेश करने में भी समर्थ हु । (11/18, 11/38,9/17,15/15,7/12 इन श्लोकों में भी इस बात का उल्लेख आया है ) परमात्मा वाली आत्मा बुद्धि मानोंकी बुद्धि जब प्रवेश करके साकार (शिव बाबा)तब उसकी पुजा होती है इसलिए शिव लिंग कहते हैं ।
आध्यात्मिक विश्वविद्यालय की ओर से















