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प्रबोधिनी मंच महाराष्ट्र साहित्य समुह तर्फे विशेष लेख – शिक्षक दिन

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देश की पहली महिला शिक्षिका व महान कवियित्री!
सावित्रीबाई फुले जी हम सभी की पहली गुरू माॅं 
शिक्षक दिवस पर राष्ट्राभिनंदन व शत शत नमन करतीं हूं।
सावित्रीबाई फुले ने 1848 में पुणे में भारत के पहले बालिका विद्यालय की स्थापना की और भारत की पहली महिला शिक्षिका बनीं। उन्होंने सभी वर्गों की लड़कियों के लिए स्कूल खोले और शिक्षा के महत्व पर जोर दिया।
मेरी प्रेरणा !.. मेरी अभीव्यक्ति!…. सिर्फ एक सोच बदलने की !…
२१ सदी के इस भारत में महिलाओं के ऊपर हो रहे अत्याचार, उनके साथ ज्यादतियों को देखकर प्रश्न उठता है कि,क्या भारत कभी फिर से विश्वगुरु बन पाएगा?
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते, त्रत् देवता, अर्थात् जहाॅं नारीयों की पूजा की जाती है, वहाॅं देवता निवास करते हैं। परंतु आज तथाकथित प्रगतिशीलसमाज में स्त्रियों पर हो रहे अत्याचारों से किस महिला का दिल रो नहीं पड़ेगा? मगर वह स्त्रियों के सम्मान या अस्मिता के संरक्षण की गुहार लगाए भी तो किससे? क़ानून ग़ुनाहग़ारों को सजा दे सकता है ।पर स्त्री का सम्मान करना तो नागरिकों को स्वयं से ही सीखना होगा।
आज की तारीख़ में देखे तो चारों ओर महिलाओं के साथ ज्यादतियाॅं दिखाई देती है। कोई समाचार पत्र या बुलेटिन ऐसा नहीं है जो ऐसी ख़बरों से भरा न हो।
समाज में बढ़ रहीं ये असि्मता महिलाओं के साथ हो रही जोर जबरदस्ती कहीं भी कहीं भी उनके साथ शारीरिक अनाचार की संभावना, आखिर ऐसे माहौल के लिए कौन। जवाबदार है?
आज की स्त्री हर स्तर पर आगे बढ़ रही है । तब समाज भले ही कुछ ना करें भले ही सहारा दे या न दे । भले उसके लिए आशाओं या उम्मीदों को कोई दीप जलाये लेकिन कम से कम उसे सम्मान से जीने तो दे ।उसका सम्मान करे क्या वह इतनी भी आशा इस समाज से नहीं कर सकती जिसका हिस्सा वह ख़ुद है । कभी नौकरी दिलवाने के नाम पर , हो कभी किसी काम के लिए लड़कियां या महिलाओं को झांसा देकर उनका दैहिक शोषण कोई मुश्किल काम नहीं। इतिहास गवाह है कि राजसभा में द्रौपदी के अपमान पर भीष्म पितामह और धृतराष्ट्र सहित संपूर्ण सभा के मौन का क्या परीणाम हुआ?
आज स्त्रियों के साथ हो रहे अनाचारों पर मौन समाज को क्या कीमत चुकानी पड़ेगी ये तो भविष्य ही बतायेगा? आजकल पूरी दुनिया में महिला दिवस मनाया जा रहा है । आखिर महिला दिवस क्यों मनाया जाता है? पूरी दुनिया में अगर आदमी और औरत की नापा जाये तो लगभग बराबरी का मामला है,दुनिया इन्हीं दो हिस्सों में बटी हुई हैं,तो फिर किस बात का महिला दिवस। इस धरती पर उतने ही प्रश्न है तो फिर उनका दिवस क्यों नहीं मनाते। पुरुष में ऐसे कौनसे गुण है जो महिलाओं में नहीं ..… शारीरिक अंतर को छोड़कर कोई ऐसी बात नहीं है जो किसी प्रौढ़ या कमतर करती हो।
लेकिन सबसे बड़ी मुश्किल वो है खुद महिलाओं को इसका साहस नहीं है।वह भी यही मांग करती है हमें बराबर समझा जायें इसके अलावा वो सिर्फ मानना ही शुरू कर दे कि हम बराबर है तोह मुश्किलें खत्म हो जाये। भारतीय नारी इस मामले से खुद को दुखियारी मानती है कि समाज उसे बराबरी का दर्जा नहीं देता । लेकिन इसके बाद तकनीक बढ़ती गई । लेकिन आदमी और महिला ने अपने आप को कम बदला जिस तेजी से और समाज में किरदार नहीं बदले।
आज वक्त है अपनी मानसिकता और सोच बदलने का । वक्त है ,हम अपनी बेटी और बेटा में फर्क ना करें। वक्त है, लड़कियां स्वाभिमानी आत्मविश्वास और आत्मसम्मान के साथ अच्छे स्तर पर पहुंचकर समाज की भलाई करें और ये व्याप्त कुरीतियों को खत्म करें ।आज वक्त है हम नारी के प्रति अपनी सोच बदले हम उन्हें अपने समाज का अटूट हिस्सा समझे याद रहें “यदि पुरुष कल है, नारी आज है”, कोमल है कमजोर नहीं शक्ती का नाम नारी है ।
माता अपने पुत्रों की प्रथम गुरु होती है। यदि वह खुद शिक्षित होगी तो वह अपने बेटी को अच्छी शिक्षा देगी । जिससे समाज का विकास होगा ।

सौ. अनुराधा लक्ष्मण मारचट्टीवार
हैदराबाद तेलंगाना.

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