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प्रबोधिनी मंच महाराष्ट्र साहित्य समूह तर्फे विशेष लेख – जीवन

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जरूरी तो नहीं हर पुरुष हर एक जैसा हो
वो सिर्फ एक को नहीं हर एक को निहारता हो
यदि आपकी मनोदशा ऐसी है तो ग़लत सोच है
यद्यपि आप ने देखा ही नहीं उन दुर्लभ पुरूषों को
जिन्होंने देखा तो बस एक स्त्री को वही उनकी
पसंदीदा स्त्री , प्रेयसी , प्रेमिका , संगनी बन गई
तत्पश्चात उन्होंने नजर उठा निहारा ही नहीं किसी
अन्य परस्त्री को !
उनकी प्रेयसी उनके साथ रहे न रहे, कदाचित
नहीं दे सके वो हृदय में किसी अन्य को वो स्थान,
जहाँ स्थाई बिठा रक्खा था अपने चित चितवन में उन्हें
जिन्होंने सदैव जीवित रक्खा अपनी स्मृतियों में उन्हें
ऐसे पुरुष यदि एक बार किसी को स्पर्श कर ले तो
नहीं लालसा होती उन्हें किसी भी स्त्री के स्पर्श की
क्यूंकि वो दुर्लभ होते है जैसे कि होती है मृगकस्तूरी
हाँ तुमने नही देखा है ऐसे कुछ पुरूषों को जिन्होंने
आज भी जीवित रक्खा है प्रेम के सही मायनों को
बन सको तो बनना ऐसा ही दुर्लभ पुरुष ताकि जिसके
भी जीवन में प्रवेश करो वो गर्व से कहे हाँ तुम
उसकी प्रिय सौभाग्यशाली प्रेयसी हूं। यही जीवन का यथार्थ सत्य है।

सौ. अनुराधा मारचट्टीवार
हैदराबाद तेलंगाना.

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