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कविता- हां मुझे भी डर लगता है

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हां मुझे भी डर लगता है
किसी के आने से
किसी के जाने से
कुछ ज्यादा पा लेने से
कुछ कीमती खो देने से
किसी से मन लगाने से
किसी को मन से उतारने से
किसी को कुछ बताने से
किसी से कुछ छुपाने से
कुछ भीषण याद आने से
कुछ महत्वपूर्ण भूल जाने से
लगातार सब कुछ हारने से
जीत कर भी हार ना जाऊ इस खयाल से
किसी से पीछे रहने से
किसी के आगे निकल जाने से
किसी का साथ होने से
किसी का साथ ना होने से
मेरे आक्रोश से
मेरे क्रोध से
हां मुझे भी डर लगता है
लेकिन यह तो इंसान का स्वभाव गुण है
तो मैं अकेली इससे कैसे चुक सकती हूं
मुझे मेरे डर को स्वीकार कर
उसके पार जाना होगा

कवियत्री- मुक्ता आगड़े PK
मुल

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