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प्रबोधिनी मंच महाराष्ट्र साहित्य समुह तर्फे विशेष कविता – माझी कविता

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मेरी मां एक शब्द सी।
मां गीता की वाणी सी।
मां आंगन की तुलसी जैसी।
मां मेरे लेखन की कलम सी।
मां मेरे कविता की वेदना सी।
मां मीरा की पदावली- सी।
मां आषाढ़ की पहली बरखा सी।
मां सावन की पुरवाई सी।
मां दिव्य शक्ति सी।
मां प्रकृति कल्याणी जैसी
मां बसन्त की सुरभी सरीखी
मां गोमुख की ऊंचाई सी ।
मां गंगा की निर्मल धारा
मां श्रध्दा की आदिशक्ति सी।
मां धरती की हरी चादर सी
मां हिमाचल पर्वत अटल सी।
मां रेवा की गहराई सी
मां की छवि ही न्यारी है
मां ममता की मुरत है,
मां सचमुच भगवान की सुरत है।

सौ अनुराधा लक्ष्मण मारचट्टीवार हैदराबाद तेलंगाना.

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