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प्रबोधिनी मंच महाराष्ट्र समुह तर्फे आजची कविता – अपेक्षा

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मैं धरती तुम आसमां
अपेक्षा है मिलन की
भ्रम को मत पालो ऐ मेरे दिल
सातत्यदृष्टि क्षितिज पाने की!१
मैं राधा तुम सांवरे…
दो बदन एक जान
नश्वर शरीर अमरआत्मा
अटूट हमारा नाता है
आशाओं से भरा ये रिश्ता
संपूर्ण कहां हो पाता है।२
ये हमारा अस्थिर मन
बूने हर अपेक्षा के जाले
ऐ दिल स्वतंत्र प्रेम पर
स्वयं को बाॅंध ले
तोड़ दे हर अपेक्षा के जाले!३
उपेक्षित हो हमारी
अपेक्षाएं
पूर्ण शरीरआनंदमय
हो जाये,
कर्म करें निष्पाप मन से
गीता भी तो यही सिखलाऐ!४
हे ईश्वर हम पर कृपा
करना
इस दिल में अपेक्षा को
जिंदा रखना
कितनी भी आये
मुश्किलें …
जिंदगी में,रूह को मेरे
फिर से जीतने की
उम्मीदों को जिंदा रखना!५
अपेक्षा और उपेक्षा
एक दुसरे के पूरक हैं
अगर ये दिल में रहे तोह
दृढ़ से संकल्प दिलों को
ज़ड -ज़मीर से मिटा दे!६
एक अलगाव में
बैठ दूर क्षितिज देख
संभ्रमित दिल उस शख्स ने
अलविदा कह दिया लेकिन
ये बावरी हर शाम उसका
इंतज़ार करती रही….
जिंदगी में ना चाहते हुए भी
क्लेश व विवाद में उलझी रही
पुरा भारत देश आशाओं पर जिंदा हैं यही तथ्य को स्वीकार कर बावरी राधा रानी
अपेक्षाएं करती रही
अपेक्षाएं करती रही !७

सौ अनुराधा लक्ष्मण मारचट्टीवार हैदराबाद तेलंगाना

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